लॉक डाउन की छूट का नाजायज फायदा 


अंकित सिंह खड्गधारी 


लॉक डाउन की छूट का नाजायज फायदा 
कोरोना का कहर देश में जारी है।और आज यह आकड़ा 60000 को भी पार कर गया है और जिस प्रकार संक्रमण की रफ़्तार इतने प्रबंधों के बावजूद बढ़ती ही जा रही है इसने सरकार की चिंता और भी ज्यादा बढ़ा रक्खी है एक तरफ तो लॉक डाउन के अलावा दूर दूर तक कोई विकल्प नज़र नहीं आता वही दूसरी तरफ धीमी से भी और ज्यादा धीमी हो चुकी अर्थव्यस्था ,रोजमर्रा की वस्तुओं की सप्लाई को लेकर ,लगातार सरकार दबाव बढ़ता ही जा रहा है कि वह कैसे एक साथ कोई ऐसी व्यवस्था लागू करे जिस से जन सामान्य कोई भी परेशानी न हो और लॉक डाउन का पालन भी होता है और इसी क्रम में जब सरकार ने लॉक डाउन तीन की घोषणा की तो लोगो के सब्र का बाँध टूटता नज़र आया लोग रोजमर्रे की वस्तुओं की अब ब्लैक मार्केटिंग भी करने लगे ,जब सरकारी तंत्र में कहीं किसी प्रकार की कोई खामी नहीं थी इसकी बावजूद ऐसी बहुत सी कठिनाइया थी जो लॉक डाउन की सख्ती के चलते जनता को झेलनी पड़ रही थी और इसी के चलते सरकार ने लॉक डाउन तीन में कुछ ढील दी जैसे सभी कार्यालयों को खोलने की इजाजत दी गयी और उन्हें सुरक्षा के तमाम इंतज़ाम भी करने के निर्देश दिए गए ,लेकिन वो कहते है न कि काम से ज्यादा बेकाम वाले ज्यादा व्यस्त होते है ठीक उसी प्रकार अब सड़को पर यहाँ वहां लोग भीड़ और लापरवाह लोगो की फ़ौज भी दिख जा रही है ये वो लोग है जिन्हे शसयद कुछ काम हो तो भी वे काम करने के बाद अपने घरो को नहीं जाते है वे सड़को पर निकल कर खुद को खतरों का खिलाडी घोसित करना चाहते है ,उन्हें शायद आदत ोाद चुकी है कि जब सरकारी डंडा पड़ेगा हम तभी किसी बात का पालन करेंगे ,आपको छोटा सा उदहारण लखनऊ का ही देता हूँ जहाँ लम्बे समय से लॉक डाउन से जूझ रहे लखनऊ वासियो को लॉक डाउन 03 में उनकी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने उन्हें थोड़ी ढील क्या दी ,वे सारी हदे ही पार करते नज़र आ रहे है , बीते दिनों किस तरह शराब की दुकानों पर भीड़ लगी वह सभी ने देखा इतना ही नहीं सब्जी मंडी से लेकर दुकानों सभी पर लोग लापरवाह नज़र आ रहे है ,कुछ ने मास्क लगाया तो सोशल डिस्टन्सिंग को भूल गए और कुछ तो मास्क लगाना ही शान के खिलाफ समझ रहे है लोग घरो के बाहर भी बेवजह खड़े देखे जा सकते है ,लखनऊ नहर चौराहे के आस पास चुंगी ,मानक नगर कनौसी ,इंद्रपुरी ,भोला खेरा ,केसरी खेड़ा ,एयरपोर्ट के पास न्यू आज़ाद नगर ये कुछ ऐसे एरिया है जहाँ पर लोग बेहद लापरवाह नज़र आ रहे है और ऐसी स्थिति सिर्फ लखनऊ में ही नहीं अपितु जहाँ भी हलकी फुलकी छूट दी गयी हर जगह नज़र आ रही है 
सरकार ने 17 मई तक लाॅकडाउन की सीमा को बढ़ा दिया है। वास्तव में देश के सभी शहरों में टेस्टिंग की रफ्तार बढ़ाई गई जिससे कोरोना के संक्रमित मरीजों की पहचान होती रही। इन्हीं कोरोना वायरस के मरीजों की संख्या पर देश के शहरों को कुछ जोनों में तब्दील कर दिया गया।
ये शहर रेड, आरेंज ओर ग्रीन जोन में रखे गए। लॅाकडाउन 3.0 में इसी जोन को आधार बनाकर कुछ छूट दी गई है ताकि अर्थव्यवस्था पर भी एक बहुत बड़ा संकट न आने पाए। इसके साथ ही अन्य राज्यों में फंसे हुए लोगों को उनके घरों तक पहुंचाने के लिए कुछ विशेष ट्रेनों को भी मंजूरी दी गई है। अब सवाल उठता है कि भारत कोरोना वायरस से निपटने के लिए आने वाले दिनों में कितना तैयार है।
लॅाकडाउन के ऐलान के बाद से ही अन्य राज्यों में फंसे लोग अपने घरों को जाना चाहते थे, अब जब सरकार उनको घरों तक पहुंचाना चाहती है तो एक बहुत बड़ा संकट पैदा होते नजर आ रहा है। लेकिन रियायतें मिलने के बाद जिस तरह की तस्वीरें और खबरें सुनने-पढ़ने और देखने को मिल रही हैं, वो चिन्ता बढ़ाने वाली हैं। तमाम जगहों पर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन न के बराबर हो रहा है। खासकर शराब की दुकानों पर जिस तरह से भारी भीड़ उमड़ी है, वो चिन्ता बढ़ाने वाली है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि सही बात तो ये है कि कोरोना ने पूरी दुनिया को एक नई दिशा दे दी है। जिसमें जीवन रक्षा के प्रति अतिरिक्त सतर्कता के साथ शारीरिक दूरी बनाये रखने पर जोर देना अनिवार्य होगा।जहां तक भारत की बात है तो यहां बड़ी आबादी और घनी बसाहट के कारण शारीरिक दूरी जैसी सावधानी का पालन करना बड़ी समस्या रहेगी। मास्क तो एक बार लोग लगा भी लेंगे लेकिन सैनिटाईजर का उपयोग और बार-बार हाथ धोने का अभ्यास सभी के बस में नहीं होगा। इसीलिये लॉक डाउन में दी जा रही छूट को प्रयोगात्मक ही मानना चाहिए क्योंकि देश में कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या में रोजाना वृद्धि होने से जिस श्रृंखला को तोड़ने के लिए लॉक डाउन किया गया वह अभी ही बनी हुई है। हां अच्छी बात यह है कि लाॅक डाउन ने कोरेना संक्रमण का प्रभावक्षेत्र सीमित जरूर किया है।और आज के समय में भी जिस प्रकार संक्रमण और देश की दुर्गति बढ़ रही रही है ऐसे समय में सरकार के पास लॉक डाउन का बहुत ज्यादा लम्बा विकल्प नहीं खुला रह गया है क्यूंकि उन्हें देश का आर्थिक रूप से भी सञ्चालन करना ही है इसीलिए अब ये मौका सारे देशवासियो के पास है कि वे भी खुद को साबित करे और इस आपत्तिकाल में सिर्फ और सिर्फ सरकार से मदद न मांगे बल्कि सरकार और देश की भी कुछ मदद करे ,आइये संकल्प ले हम सामाजिक दूरी बनाकर रखेंगे ,घर से बिना मास्क लगाए नहीं निकलेंगे ,और अगर बहुत जरुई होगा तो ही हम अपने घरो से बाहर निकलेंगे वैसे एक बात तो हो गई कि लोग कोरोना से पहले जितने आतंकित नहीं हैं। भारत में अपेक्षाकृत कम मौतों ने भी जनता के मन में समाये भय को निकाल फेंका है। लोग ये समझ गये हैं कि कोरोना के संक्रमण से बचना बहुत मुश्किल नहीं है और संक्रमित होने वाला जीवित नहीं बचेगा ये आशंका भी गलत है।भारत का मौसम और यहां की लोगों के रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी कोरोना की गम्भीरता को घटाने वाला माना जा रहा है। यद्यपि इसे लेकर मत भिन्नता है। लेकिन जैसी आशंका थी उसके अनुसार भारत में कोरोना तीसरी पायदान अर्थात सामुदायिक संक्रमण तक नहीं पहुंचा तो ये भी शोध का विषय है।पर्यावरण की स्थिति में आये आश्चर्यजनक सुधार के कारण हो सकता है इस साल मानसून समय से पहले आ जाए और बारिश भी ज्यादा हो। वह मौसम वैसे भी संक्रामक बीमारियाँ फैलने का होता है। इसलिए आगामी महीने भी सतर्कता और सावधानी के रहेंगे। खबर आ रही है कि शालाएं खुलने पर बच्चों को मास्क लगाना अनिवार्य किया जाएगा।वे इसके बारे में कितने गम्भीर रहेंगे ये कहना कठिन है। इसलिए ये मान लेना कि ग्रीन या औरेंज जोन वाले कोरोना संकट से बाहर आ गये , गलत होगा। पूरी दुनिया में ये माना जा रहा है कि उससे पूरी तरह मुक्ति मिलने में साल-दो साल लग सकते हैं।देश के कई राज्यों में कोरोना संक्रमितों की संख्या कम है। मसलन हिमाचल प्रदेश। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हम लापरवाह हो जाएं। जिस तरह से कुछ लोगों की प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से आवाजाही हो रही है, उससे कोरोना के मामलों में इजाफा होने का डर बना हुआ है। अतः हर व्यक्ति के लिए कायदे-कानूनों का पालन करने की जिम्मेवारी और बढ़ जाती है।हमें हरसंभव यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता होगी कि हम दूसरों से शारीरिक दूरी बना कर रखें और पुलिस-प्रशासन को नियम तोड़ने वालों पर सख्ती करने की आवश्यकता होगी। इसके अलावा सरकार को बुजुर्गों की समस्याओं पर विचार करना होगा।भारत में तो भीड़ वैसे भी एक संस्कृति है। हमारे सामाजिक , धार्मिक और राजनीतिक आयोजन भीड़ के बिना अधूरे माने जाते हैं। कुछ लोग पारिवारिक आयोजनों में भी ज्यादा लोगों को बुलाना शान समझते हैं। उस दृष्टि से कोरोना को लेकर किसी भी तरह का अति आत्मविश्वास घातक हो सकता है।विश्व स्वास्थ्य संगठन कई बार यह दोहरा चुका है कि कोरोना वायरस का अस्तित्व समाप्त नहीं होगा। उसकी क्षमता और प्रभाव कम-ज्यादा हो सकते हैं, लेकिन यह इंसानी शरीर और जिंदगी के साथ चिपका ही रहेगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस बार गंभीर चेतावनी दी है कि कोरोना वायरस की दूसरी लहर भी आएगी और वह मौजूदा लहर से अधिक घातक साबित होगी।दूसरी लहर का संभावित खतरा एशिया और यूरोप पर ज्यादा होगा। यूरोपीय देशों में तो इस लहर ने लाखों इंसानों की जिंदगी छीनी है। दूसरी तबाहियां तो अलग हैं। एशिया में चीन और भारत सबसे बड़े देश हैं, जहां कोरोना की मार अब भी जारी है।कोरोना से बिगड़ती स्थिति के बावजूद सरकार लोगों को उनकी जरूरत की चीजों के लिए छूट दे रही है। मगर कुछ लोग उसका नाजायज फायदा उठा रहे हैं। सुबह से लेकर शाम तक वाहनों पर दो दो, तीन-तीन सवारियां बिठाकर कानून का मखौल उड़ाते नजर आते हैं। लोग अब भी अपनी आदतों से बाज नहीं आ रहे हैं।सबसे खराब स्थिति सब्जी मंडियों में दिखती है जहां मेले जैसी उमड़ती भीड़ और सोशल डिस्टेंसिंग की उड़ती धज्जियां न सिर्फ सरकार को सख्त लॉकडाउन के लिए मजबूर करेगी, वरन् संक्रमण आम आदमी को भी चपेट में ले लेगा।इस बीच, तेलंगाना सरकार ने लॉकडाउन 29 मई तक बढ़ाने का फैसला लिया है। मुख्यमंत्री केसीआर ने कहा कि लोगों की जान बचाने के लिए यह प्रतिबंध जरूरी है। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में भी डीएम ने 31 मई तक लॉकडाउन के प्रतिबंध जारी रखने का आदेश दिया है। असल में सरकारी उपायों और कदमों के बावजूद कोरोना वायरस वक्त के साथ-साथ चिंता भी बढ़ा रहा है।चुनौतियां हर दिन लगातार बढ़ रही हैं जिससे पार पाना बिल्कुल भी आसान नजर नहीं आ रहा है। ये बेहद सख्त इम्तेहान की घड़ी है राज्य सरकारों के साथ-साथ केन्द्र सरकार को भी कड़ी मेहनत करनी होगी और एक दूसरे के साथ मिलकर हर चुनौती का कड़ा मुकाबला करना होगा। देशवासियों को भी इस संकट की घड़ी में सरकार के दिशा-निर्देशों का पालन करना चाहिए। लाॅकडाउन के दौरान मिली छूट का बेजा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। वरना थोड़ी सी भी लापरवाही भारी साबित हो सकती है। कोरोना से डरना उतना जरुरी नहीं जितनी सतर्कता जरूरी है। इसलिए जनजीवन सामान्य होने पर तो अतिरिक्त एहतियात की जरूरत होगी। वरना लॉक डाउन को और बढ़ाने के सिवाय दूसरा चारा नहीं बचेगा।


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